सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हां, डर लगता है मुझे,

शक्ति और पराक्रम को कैसे पहचाने? शक्ति और पराक्रम की पहचान क्या है?

 शक्ति और पराक्रम को कैसे पहचाने? शक्ति और पराक्रम की पहचान क्या है?

धर्मात्मा और शक्तिशाली व्यक्ति की पहचान के लिए धर्म का होना वास्तव में आवश्यक है। श्री राम का जीवन इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिन्होंने अपने आदर्शों और धर्म के प्रति समर्पण के माध्यम से अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। उनके जीवन की घटनाएँ और उनके द्वारा लिए गए निर्णय हमें यह सिखाते हैं कि धर्म का पालन करते हुए भी शक्तिशाली बना जा सकता है।

अहंकार की चादर को हटाना और धर्म को समझना व्यक्ति के आत्म-विकास के लिए भी जरूरी है। जब हम अहंकार को त्यागते हैं और धर्म के प्रति खुले रहते हैं, तब हम न केवल अपने आप को बेहतर बना सकते हैं, बल्कि समाज को भी सकारात्मक दिशा में ले जा सकते हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर लाभकारी है।

श्री राम और सीता जैसे पात्रों के जीवन से प्रेरणा लेकर, हम बच्चों में धर्म और आदर्शों के महत्व को सिखा सकते हैं। इससे न केवल उनका नैतिक विकास होगा, बल्कि वे समाज के लिए भी उपयोगी नागरिक बनेंगे। धर्म के इन सिद्धांतों को अपनाकर, हम व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर सकारात्मक परिवर्तन की ओर बढ़ सकते हैं।


 अहंकारी व्यक्ति अक्सर चापलूसी करने वालों को पसंद करते हैं, यह व्यवहारिक मनोविज्ञान में भी देखा गया है। अहंकारी व्यक्ति अपनी प्रशंसा और समर्थन की तलाश में रहते हैं, और वे अक्सर उन लोगों को अपने आस-पास रखना पसंद करते हैं जो उनकी हर बात से सहमत होते हैं। यह उनके अहंकार को संतुष्ट करता है और उन्हें अपनी धारणाओं में और अधिक दृढ़ बनाता है।
दूसरी ओर, अधर्मी व्यक्ति अक्सर स्वार्थी होते हैं और उनके रिश्ते और व्यवहार उनके निजी लाभ से प्रेरित होते हैं। वे अक्सर उन लोगों के साथ रिश्ते बनाते हैं जिनसे उन्हें फायदा होता है, और जब उनकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है, तो वे उन्हें छोड़ देते हैं। यह व्यवहार उनके धर्म की कमी को दर्शाता है, और इससे उनके वफादारी की कमी भी स्पष्ट होती है।
इन व्यवहारों को समझना और उनसे सीखना महत्वपूर्ण है, ताकि हम अपने जीवन में धर्म और आदर्शों को महत्व दे सकें। यह हमें न केवल अच्छे इंसान बनने में मदद करता है, बल्कि हमारे रिश्तों और समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी को भी मजबूत करता है। धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति अपने आस-पास के लोगों के प्रति सच्ची समझ और सहानुभूति रखते हैं, और वे अपने निर्णयों में नैतिकता और आदर्शों को प्राथमिकता देते हैं। इस प्रकार, वे अपने जीवन में और दूसरों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सक्षम होते हैं।


यह कहना कि अहंकारी और अधर्मी लोग हमेशा गलती करते हैं और धोखा खाते हैं, यह एक सामान्यीकरण होगा। हालांकि, यह सत्य है कि अहंकार और अधर्म व्यक्ति की सोच और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। अहंकार के कारण, व्यक्ति अपने आस-पास की सच्चाई और लोगों के अच्छे गुणों को नहीं पहचान पाता है। इसी तरह, अधर्मी व्यक्ति अक्सर नैतिकता और धर्म के मार्ग से भटक जाते हैं, जिससे उनके निर्णय और कार्य गलत दिशा में जा सकते हैं।

इसलिए, यह कहना उचित होगा कि अहंकार और अधर्म के कारण व्यक्ति की पहचानने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, और इससे उन्हें धोखा खाने का जोखिम बढ़ सकता है। लेकिन, हर व्यक्ति की परिस्थितियां और प्रतिक्रियाएं अलग होती हैं, और यह सभी पर लागू नहीं होता। अंततः, व्यक्ति की आत्म-जागरूकता, नैतिकता, और धर्म के प्रति समर्पण ही उसके निर्णयों और पहचान की गुणवत्ता को निर्धारित करते है।

 शक्ति और समर्थता की सही पहचान के लिए धर्म का विकास और अहंकार का त्याग वास्तव में आवश्यक है। जब हम अहंकार की चादर को उतार फेंकते हैं, तो हम अपने आस-पास की दुनिया को और अधिक स्पष्टता और सच्चाई के साथ देख पाते हैं। इससे हमें न केवल दूसरों की शक्तियों को पहचानने में मदद मिलती है, बल्कि हम अपनी खुद की शक्तियों को भी पहचान सकते हैं।

धर्म का विकास हमें नैतिकता और आदर्शों के प्रति सचेत रखता है, और यह हमें अपने जीवन में सही निर्णय लेने की दिशा में मार्गदर्शन करता है। यह हमें उन गुणों को विकसित करने में मदद करता है जो हमें एक अच्छा इंसान बनाते हैं, जैसे कि क्षमा, निर्भयता, और त्याग।


अहंकार की चादर को, जब हम उतार फेंकेंगे,
धर्म की रोशनी में, नई दुनिया देखेंगे।

शक्ति का सार तब, स्पष्ट हो जाएगा,
समर्थता का मार्ग, हमें दिख जाएगा।

नैतिकता की राह पर, जब हम चल पड़ेंगे,
सच्चे आदर्शों के साथ, जीवन संवरेगा।

क्षमा, निर्भयता, त्याग की शक्ति जगेगी,
धर्म की इस यात्रा में, मानवता बढ़ेगी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः

 (ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण) अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं? व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌॥ आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन साङ्‍ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌॥ श्रीभगवान बोले- हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा (साधन की परिपक्व अवस्था अर्थात पराकाष्ठा का नाम 'निष्ठा' है।) मेरे द्वारा पहले कही गई है। उनमें से सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग से (माया से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरतते हैं, ऐसे समझकर तथा मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं में कर्तापन के अभिमान से रहित हो...

गुणत्रयविभागयोगो नामचतुर्दशोऽध्यायः

  (ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत्‌ की उत्पत्ति)   श्रीभगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम्‌। यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥ श्री भगवान बोले- ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।  सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥ इस ज्ञान को आश्रय करके अर्थात धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌।  सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥ हे अर्जुन! मेरी महत्‌-ब्रह्मरूप मूल-प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ को स्थापन करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पति होती है सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ हे अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर...

श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय :

  (श्रद्धा का और शास्त्रविपरीत घोर तप करने वालों का विषय) अर्जुन उवाच ये  शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥ अर्जुन बोले- हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी? श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु॥ श्री भगवान्‌ बोले- मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा (अनन्त जन्मों में किए हुए कर्मों के सञ्चित संस्कार से उत्पन्न हुई श्रद्धा ''स्वभावजा'' श्रद्धा कही जाती है।) सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी- ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है। उसको तू मुझसे सुन सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥. हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि रा...

ज्ञानकर्मसंन्यास योगो नाम चतुर्थोऽध्यायः

  ( सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय ) श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌।  विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌॥ श्री भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥ हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌॥ तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥ अर्जुन बोले- आपका जन्म तो अर्वाचीन-अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अर्थात कल्प के आदि में हो चुका था। तब मैं इस बात को कैसे समूझँ कि आप ही ने कल्प के आदि मे...

दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः

  (फलसहित दैवी और आसुरी संपदा का कथन)   श्रीभगवानुवाच  अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌॥ श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति (परमात्मा के स्वरूप को तत्त्व से जानने के लिए सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में एकी भाव से ध्यान की निरन्तर गाढ़ स्थिति का ही नाम 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' समझना चाहिए) और सात्त्विक दान (गीता अध्याय 17 श्लोक 20 में जिसका विस्तार किया है), इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान्‌ के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्‌। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्‌॥ मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण (अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों म...

ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः

  ( विज्ञान सहित ज्ञान का विषय )   श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन  ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥ मैं तेरे लिए इस विज्ञान सहित तत्व ज्ञान को सम्पूर्णतया कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः॥ हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्‍कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्‌। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्‌॥ पृ...

विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः

  ( विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना )  अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्‌। यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥ अर्जुन बोले- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया। त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्‌॥ क्योंकि हे कमलनेत्र! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर। द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥ हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो। योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्‌॥ हे प्रभो! (उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय तथा अन्तर्यामी रूप से शासन करने वाला होने से भगवान का नाम 'प्रभु' है) यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है- ऐसा आप मानते हैं, तो हे...

आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः

  ( कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण )   श्रीभगवानुवाच  अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥ श्री भगवान बोले- जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव। न ह्यसन्न्यस्तसङ्‍कल्पो योगी भवति कश्चन॥ हे अर्जुन! जिसको संन्यास (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥ योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जात...

अक्षर ब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः

 ( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )   अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥ हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥ श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर 'ब्रह्म' है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा 'अध्यात्म' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह 'कर्म' नाम से कहा गया है अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, ह...

भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः

  (साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय और भगवत्प्राप्ति के उपाय का विषय)   अर्जुन उवाच  एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥ अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं- उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं? श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए (अर्थात गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में लिखे हुए प्रकार से निरन्तर मेरे में लगे हुए) जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌॥ सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व...