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हां, डर लगता है मुझे,

आखिर क्यों अपमान या अपमानित होना बहुत अच्छा है?

आखिर क्यों अपमान या अपमानित होना बहुत अच्छा है?

अपमान एक न्यूट्रल शक्ति है। इसका प्रभाव व्यक्ति के व्यक्तित्व के हिसाब से पड़ता है। अपमान एक ऐसी शक्ति है, जिसका उपयोग 
आत्मसंयम, समझदारी और सही तरीके से किया जाए तो, वह उस व्यक्ति को इतिहास में दर्ज करा सकती है, इतिहास में अमर करा सकती है। अपमान का प्रभाव कितना होगा, कैसा होगा यह उस व्यक्ति के सहनशीलता, सहनशक्ति, आत्म नियंत्रण और समझदारी पर डिपेंड करता है। इसका प्रभाव इस पर भी डिपेंड करता है कि आखिर अपमान कर कौन रहा है।

अपमान करना बुरा है, पर अपमान सहना अच्छा और बहुत अच्छा हो सकता है। फर्क इस से पड़ता है कि, आखिर अपमान, हो किस का रहा है? अपमान अगर सत्य पारायण, सत्यनिष्ठ, धर्म परायण और एक योगी का हो रहा है, तो इसके प्रतिफल के रूप में जो उत्पन्न होगा, उस से उस व्यक्ति, और उसके समाज को उन्नति, प्रगति और विकास की प्राप्ति होगी। 

अपमान एक न्यूट्रल शक्ति है। इस शक्ति का प्रभाव कैसा होगा यह डिपेंड करता है की, जिसका अपमान हुआ उस व्यक्ति का व्यक्तित्व कैसा है, मतलब यह है कि वह व्यक्ति कैसे विचारों वाला है। अगर उस व्यक्ति का व्यक्तित्व योगी पुरुष, साधु पुरुष, धर्मात्मा की तरह है तो, इसका प्रतिफल उस व्यक्ति के लिए, उसके समाज के लिए, उसके समुदाय के लिए अच्छा और इतिहास में वर्णित हो सकने लायक होगा। 

अगर अपमान ऐसे व्यक्ति का हो जो सत्य कर्म वाला है, सद्भाव वाला है, और जो योगी है जिसने अपने क्रोध, लोग, मोह पर नियंत्रण कर रखा है, तो यह अपमान उस व्यक्ति को सक्सेसफुल ओर कार्य कुशल बनाएगा। ऐसे व्यक्तियों पर अपमान का प्रभाव एक पॉजिटिव इफेक्ट के रूप में होता है। अपमान इतनी बड़ी शक्ति है इसका उपयोग करके इंसान, व्यक्ति इतिहास में अपने नाम को दर्ज करा सकता है, अमर तक हो सकता है। उदाहरण के तौर पर आप दानवीर धर्म परायण महाभारत के कर्ण को ले सकते हैं।

वही अपमान अगर दुष्ट प्रवृत्ति वाले इंसान का होगा, तो वह उस व्यक्ति, साथ ही साथ उस व्यक्ति के समाज, और परिवार के नास का कारण हो सकता है। क्योंकि ऐसे व्यक्तियों का व्यक्तित्व ही, प्रवृत्ति ही दुष्ट होती है। वह इस शक्ति का प्रयोग नास और दूसरों का बूरा करने के लिए करेंगे।

ऐसे व्यक्तियों पर अपमान के प्रभाव से 'क्रोध' उत्पन्न होता है। और क्रोध से उनके अंदर अत्यंत थी 'मूड भाव' उत्पन्न होता है। वह 'मूड भाव' उनके सोचने समझने की शक्ति का नाश कर देता है। और जिस इंसान की सोचने और समझने की शक्ति का नाश हो गया हो ऐसा व्यक्ति खुद के लिए विनाश का कारण होते ही है, साथ ही साथ दूसरों का भी विनाश का कारण बनते हैं। उदाहरण के तौर पर महाभारत के मामा शकुनि को ले सकते हैं।

अपमान, कठिनाइयां इनका अपना कोई स्वरूप नहीं होता, यह इस तरह कार्य करती हैं जिस तरह हम और आप इसे करवाना चाहते हैं। या यह उसी तरह उपयोगी होती हैं, जिस तरह हम इनका उपयोग करना चाहते हैं। हां इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि हम जिस प्रवृत्ति के हैं, हमारे अंदर विद्यमान शक्तियों का उपयोग भी हम अपने उसी प्रवृत्ति के हिसाब से करते हैं

जीवन अमूल्य है, इसे सत्य निष्ठ, एक योगी, एक धर्मात्मा की तरह जिए। जिससे आप अपने अंदर विद्यमान इन सारी शक्तियों का उपयोग आप अपने परिवार और अपने समाज के उत्थान, उन्नति और विकास के लिए कर पाए।


कुछ लोग अपमान को एक चुनौती के रूप में देखते हैं और इसे अपने व्यक्तिगत विकास के लिए एक प्रेरणा के रूप में उपयोग करते हैं। वे इसे अपनी क्षमताओं को मजबूत करने और अपने आत्म-सम्मान को बढ़ाने का अवसर मानते हैं। दूसरी ओर, कुछ लोग अपमान को नकारात्मक रूप से लेते हैं और इससे उनका आत्म-सम्मान कम हो सकता है, जिससे उन्हें निराशा और अवसाद का अनुभव हो सकता है।

इसलिए, अपमान के प्रभाव का अच्छा या बुरा होना उस व्यक्ति की आंतरिक शक्ति, उनके जीवन के दृष्टिकोण, और उनके सामना करने की क्षमता पर निर्भर करता है। यह एक व्यक्तिगत यात्रा है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभवों से सीखता है और उन्हें अपने जीवन में लागू करता है।

एक उदाहरण जिससे मैं अपनी बात को आपको और गहराई से समझा सकता हूं। जराध्यान दीजिए। 

कर्ण, महाभारत के एक महत्वपूर्ण पात्र हैं, जिन्हें उनके दानशीलता और वीरता के लिए याद किया जाता है। उनका जीवन अपमान और चुनौतियों से भरा था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी आत्म-शक्ति और धैर्य को बढ़ाने का अवसर माना। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि अपमान और कठिनाइयों का सामना करने के बाद भी एक व्यक्ति अपने आदर्शों और मूल्यों के प्रति सच्चा रह सकता है।

कर्ण का जीवन यह भी दर्शाता है कि अपमान का सामना करने वाला व्यक्ति अगर अपने आत्म-सम्मान और आदर्शों को बनाए रखता है, तो वह समय के साथ अपनी पहचान और सम्मान प्राप्त कर सकता है। यह उदाहरण हमें यह भी बताता है कि अपमान का प्रभाव व्यक्ति के व्यक्तित्व और उसके द्वारा लिए गए निर्णयों पर निर्भर करता है। कर्ण ने अपने अपमान को अपनी ताकत बनाया और इतिहास में एक अमर छाप छोड़ी। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि अपमान को सकारात्मक ऊर्जा में बदलना संभव है और यह व्यक्ति के व्यक्तित्व को और भी उज्ज्वल बना सकता है।

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