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हां, डर लगता है मुझे,

क्या है वह, जो मनुष्य को व्याकुल, परेशान और अशांत रखता है।

क्या है वह, जो मनुष्य को व्याकुल, परेशान और अशांत रखता है।

जब इंसान ऐसी मानसिकता को अपने अंदर पोषण देता है, या उसे पोषित करता है, जो उस मनुष्य को व्याकुल, परेशान, अशांत कर देती है, तब वही पोषण उस मनुष्य के पतन का कारण बनता है। आपने कभी इस बात को समझने का प्रयास किया है, बाहरी वस्तु, भाव, चाहे जो भी कुछ हो उनका प्रभाव हम पर कुछ समय के लिए ही होता है, पर उनसे उत्पन्न होने वाले भाव जिसे आप इंट्रेस्ट भी कह सकते हैं, वह बहुत समय तक हमारे मस्तिष्क में हमारे अंदर जीवित रहता है। और अपना प्रभाव दिखाता रहता है, क्या कारण हो सकता है, कि हम उस भाव को, उस प्रकरण को, अपने मस्तिष्क से निकाल नहीं पाते, जो हमारे व्याकुलता, परेशानी और हमें अशांत रखने का कारण होता है।

उन सभी भावनाओं और विकारों को समझाने का प्रयास करेंगे, जिससे कि आप अपने जीवन से व्याकुलता, परेशानी और अशांति से रक्षा कर पाए।

अगर बचना चाहते हो ऐसी भावनाओं से, ऐसी शक्तिओ से, जो आपको व्याकुल, परेशान और अशांत करती हैं। तो पोषित करना छोड़ना होगा, उन सभी मानवीय विकारों को, मस्तिष्क के विकारों को जो हमारे अंदर पोषित हो रहे हैं।

अगर हम अपने अंदर पोषित कर रहे हैं, पोषण दे रहे हैं, दूसरों का अहित करने की भावना को, दूसरों को नुकसान पहुंचाने की भावना को, दूसरों को हानि पहुंचाने की भावना को तो इस भावना से उसे दूसरे व्यक्ति का कुछ अहित हो या ना हो, लेकिन वह भावना जिसे आप अपने अंदर पोषण देकर बड़ा कर रहे हैं, जिसे आप अपने अंदर पोषित कर रहे हैं, आपका अहित जरूर करेगी और यही ब्रह्मांड का सत्य है।

अगर हम अपने अंदर पोषित कर रहे हैं, क्रोध को, दूसरे का अहित करने की भावना को, तो यह क्रोध, यह भावना दूसरो का अहित करेगी या नहीं, पर यह निश्चित है, कि यही क्रोध, और यही भावना, आपका यानी उस व्यक्ति का जो इन्हें पोषित कर रहा है, पोषण दे रहा है, उसका नाश अवश्य कर देगी। 

अगर हम पोषण दे रहे हैं ईशा को, अपने अंदर बढ़ाने के लिए, तो यही ईर्ष्या एक दिन आपके असंतोष का कारण बनेगी और नाश कर देगी, सुख शांति और समृद्धि का।

अगर आप अपने अंदर आश्रय दे रहे हैं, अभिमान को, और पोषण दे रहे हैं लोभ को, तो यह मान लीजिए की पतन होना निश्चित है। 

अगर आप अपने अंदर पोषित कर रहे हैं डर यानी भय को, तो आप अपने स्वेच्छा से नाश कर रहे हैं अपनी शांति और आगे बढ़ कर सक्सेस हासिल कर लेनी की भावना का।

अगर जीवन में सुख शांति और समृद्धि चाहिए अपने लिए, अपने परिवार के लिए, अपने समाज के लिए तो खत्म करना होगा पोषण देना उन सभी विकारों को, दूसरों का अहित करने की भावनाओं का।

भगवान श्री कृष्ण ने कहा है, हर एक मनुष्य का जीवन एक उपजाऊ भूमि की तरह है। इस भूमि में जिस तरह के भी कर्म हम बोएंगे वह भूमि इसी तरह का फल उत्पन्न कर के देगी हमें। हमेशा इस बात का ध्यान रखें और प्रयास करें कि हमारे सभी कर्म पावन हो।

अब निश्चय आपको करना है, क्योंकि जीवन आपका है। अब यह आप पर डिपेंड करता है, कि आप अपने लिए क्या चाहते हैं, सुख, शांति और समृद्धि या व्याकुलता, परेशानी और अशांति, निर्णय आपको लेना है, क्योंकि जीवन आपका है।

अपने अंदर पोषित करो, पोषण दो सद्भावनाओं को, सत्कर्मों का और जीवन को जियो नीति, न्याय और धर्म के आधार पर। जीवन में समस्याएं तो आएंगी, लेकिन आपकी सद्भावना और सत्कर्म उन समस्याओं को, उन संघर्षों को अप्रभावित कर देंगी। और हम सभी का जीवन सुख, शांति, समृद्धि के साथ जीवन जी पाएंगे। जीवन के उस सुंदर पथ पर खुशहाली के साथ आगे बढ़ पाएंगे।

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