सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हां, डर लगता है मुझे,

मां सीता से एक आदर्श नारी, आदर्श मां, आदर्श पत्नी बनने की सीख

इस ब्लॉग पोस्ट का आरंभ करने से पहले मैं आप सबको बता देना चाहता हूं, की मां सीता एक इतनी महान चरित्र के आदर्श को संपूर्ण रूप से बता देने में, समझा देने में मैं क्या कोई भी सक्षम नहीं होगा। पर मैं मां सीता के आशीर्वाद से कोशिश करूंगा की उन आदर्शों के वैल्यू को अपने ब्लॉग पोस्ट में अपनी पूरी क्षमता के हिसाब से दर्शा सक्कू। बाकी सब मां सीता के आशीर्वाद पर छोड़ देते हैं। जय मां सीता जय श्री राम।


हम आप हम सभी बखूबी जानते हैं मां सीता के बारे में। मां सीता जिन्होंने आदर्श के कीर्तिमान को स्थापित किया एक नारी के रूप में, एक पत्नी के रूप में, एक मां के रूप में। मां सीता ने अपने जीवन चरित्र के माध्यम से एक नारी को किस प्रकार जीवन जीना चाहिए इसकी सीख दी है। मां सीता ने अपने जीवन चरित्र में उन मूल्यों को उजागर किया है, जिन मूल्यों के राह पर चलकर हर एक नारी एक आदर्श मां बन सकती है, एक आदर्श पत्नी बन सकती है, एक आदर्श नारी बन सकती है। मां सीता का जीवन चरित्र प्रेरणा स्रोत है हर नारी के लिए। इस धरती पर जो कोई भी वूमेंस अगर मां सीता द्वारा आचरीत जीवन मूल्यों को अपने जीवन में अपनाएगी, उनका अनुसरण करेगी तो उस नारी को एक आदर्श नारी, एक आदर्श मां और एक आदर्श पत्नी बनने से कोई नहीं रोक सकता।


कर्तव्य निष्ठा: जैसा कि हम सभी जानते हैं की मां सीता ने कर्तव्य निष्ठा के ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए हैं, जो आज भी कर्तव्य निष्ठा के मार्ग को प्रकाशित कर रहे हैं। और हम सभी को कर्तव्य निष्ठ बने रहने की प्रेरणा दे रहे हैं।


मां सीता ने अपने सारे जीवन कर्तव्यों को बहुत ही कुशलता से संपूर्ण रूप से निभाया है। चाहे वह कर्तव्य एक आदर्श मां के रूप में हो या एक महान पत्नी के रूप में हो या एक वीरांगना नारी के रूप में हो। उनके सामने जिस समय, जो भी कर्तव्य आए उन्होंने उनका संपूर्ण रूप से निभाया है। हमने आपने हम सभी ने यह देखा है कि मां सीता ने विषम से विषम, मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य को नहीं त्यागा है। सदा उनको निभाया है।


आज की नारी को मां सीता से कर्तव्य निष्ठा को कैसे निभाया जाए इसकी सीख लेनी चाहिए। और अपने जीवन को कर्तव्य निष्ठ बनाना चाहिए। एक आदर्श कर्तव्य निष्ठ मां बनने के लिए, एक आदर्श पत्नी बनने के लिए और एक आदर्श नारी बनने के लिए मां सीता के जीवन से सीख लेनी चाहिए और उन सिखों को अपने जीवन में उतारना चाहिए।


जीवन में कर्तव्य निष्ठा एक ऐसा गुण है जो जीवन को उन्नति, प्रगति और खुशियों के मार्ग पर ले जाता है।


त्याग: मां सीता ने त्याग के ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए हैं जो आज भी नारी समाज को त्याग के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। त्याग एक ऐसा गुण है जो इंसान को सदा सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर रखता है।


त्याग के बिना किसी के लिए भी आदर्शवादी बनना या किसी के लिए आदर्श बनना असंभव है। क्योंकि एक आदर्श मां, एक आदर्श पत्नी और एक आदर्श नारी बनने के लिए मुख्य इनग्रेडिएंट त्याग ही है।


मां सीता त्याग की मूर्ति है, उन्होंने अपने जीवन में इतने महान त्याग किए हैं जिन्हें सोच कर भी हृदय और आत्मा में उनके प्रति सम्मान से भर आती है।


सतीत्व: माता सीता एक सती नारी थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्री राम को समर्पित कर दिया था। भगवान श्री राम को ही अपना सर्वस्व माना था। माता सीता ने अपने सतीत्व धर्म को अपने जीवन से भी ऊपर स्थान दिया था। माता सीता ने सतीत्व धर्म के रास्ते में आने वाली बड़ी से बड़ी बढ़ाओ को भी स्वीकार किया उनसे संघर्ष किया और सदा अपने सतीत्व धर्म पर एडिट रही। आज की नारी के लिए माता सीता एक महान उदाहरण है सतीत्व की। माता सीता ने अपने जीवन काल में सतीत्व धर्म को पालन करने के लिए, जो भी त्याग करना पड़ा उन सब का त्याग किया, जिन भी बढ़ाओ से लड़ना पड़ा उन सब से उन्होंने संघर्ष किया और उन पर विजय प्राप्त कीया और सदा अपने सतीत्व धर्म पर एडिट रही।


एक स्त्री को देवी तुल्य बना देने वाला गुन उसका सतीत्व ही होता है। एक स्त्री की सतीत्व की शक्ति इतनी महान होती है कि उसके सामने देवता, दानव या इस संसार की कोई शक्ति जीत नहीं सकती। एक स्त्री के सतीत्व के सामने इस संसार की हर एक शक्ति नतमस्तक होती है।


धैर्य-संयम: धैर्य साहस का ही एक स्वरूप है। और इसमें कोई दो राय है ही नहीं की माता सीता साहसी नहीं थी। माता सीता ने अपने कर्तव्य पालन के लिए स्वयं से ही वनवास में जाना स्वीकार किया था। रावण की अशोक वाटिका में रहते हुए, राक्षसों के बीच रहते हुए, उन्होंने कभी भी अपने संयम को नहीं खोया। सदा अपने विश्वास को भगवान श्री राम पर बनाए रखा। अशोक वाटिका में रहते हुए रावण ने अपनी पूरी शक्ति और क्षमता से माता सीता के धैर्य और संयम को तोड़ने का प्रयास किया। पर वह संपूर्ण रूप से असफल हुआ। आज की नारी को माता सीता से अगर कोई गुण सीखना है तो, वह धैर्य और संयम का हो सकता है।


एक नारी के अंदर अगर धैर्य, संयम हो तो वह अपने पूरे परिवार को संतुलित रख सकती है और उनकी उन्नति, प्रगति में मदद कर सकती है।


विश्वास: माता सीता ने सदैव भगवान श्रीराम पर विश्वास रखा और उस विश्वास को मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी स्थिर रखा, अखंडित रखा। उनका भगवान श्री राम पर विश्वास ही है कि आज हम जय सियाराम कहते हैं। माता सीता का विश्वास भगवान श्री राम के प्रति इतना निर्मल और पवित्र था की, भगवान श्री राम के प्रत्येक निर्णय को माता सीता ने बिना किसी संकोच के सहजता से ही स्वीकार कर लिया। और सदा एक साथी की तरह उनके हर निर्णय में उनके साथ खड़ी रही।


आज की नारी को अगर विश्वास के महत्व को समझना हो तो वह माता सीता  के जीवन चरित्र से समझ सकती हैं। विश्वास एक ऐसी शक्ति है जो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी संबंधों को बांधे रखती है।



प्रेम: मां सीता प्रेम और ममता की एक मूरत है। एक आदर्श पत्नी के रूप में उन्होंने भगवान श्री राम से अत्यंत शुद्ध और पवित्र प्रेम किया। और एक आदर्श मां के रूप में उन्होंने अपने दोनों बच्चों को ममता के रूप में धर्म, न्याय, नीति की शिक्षा प्रदान की। उन्होंने मां के रूप में अपने सारे कर्तव्यों का संपूर्णता से पालन किया। और समाज को, अपने देश को एक सक्षम नागरिक और राजा दिया।


आज की स्त्री शक्ति को मां सीता से सच्चे प्रेम की सीख लेनी चाहिए। और मां सीता के जीवन चरित्र से सच्चे प्रेम के महत्व को समझना चाहिए।


समर्पण: माता सीता ने अपने संपूर्ण जीवन को भगवान श्री राम को समर्पित कर दिया था। भगवान श्री राम के आदेशों को पालन करना और जीवन को उनके हिसाब से जीना ही माता सीता के लिए धर्म में जीवन था। माता सीता के इस समर्पण के कारण ही भगवान श्री राम और माता सीता ने अपने जीवन में एक सच्चे प्रेम और समर्पण के उच्चतम एग्जांपल को समाज के उत्थान और विकास के लिए प्रस्तुत किया। माता सीता द्वारा प्रस्तुत किए गए जीवन चरित्र रूप एग्जांपलों के कारण ही आज मानव समाज, स्त्री समाज धर्म न्याय नीति के उच्चतम स्तर पर है।


जिस भी स्त्री ने माता सीता से समर्पण के इस गुण को सिखा उसका जीवन सदा प्रेम से भरा हुआ रहेगा। और उसके पारिवारिक संबंध सफलता की उच्चतम कोटी को छुएंगे।


साहस: हम सब जानते हैं भगवान श्री राम अत्यंत साहसी थे, और उनके साथ-साथ माता सीता भी अत्यंत साहसी थी। माता सीता एक स्त्री थी फिर भी उन्होंने 14 वर्ष वन में बिताया, वह भी नीति, न्याय और धर्म का पालन करते हुए एक योगिनी की भांति। देखा जाए तो माता सीता ने साहस के उन उच्चतम स्तरों को प्रस्तुत किया है, जिस मे साहसी से साहसी इंसान भी अपने साहस का त्याग कर दे।


अगर साहस के सच्चे स्वरूप को देखना हो तो वह हमें माता सीता के जीवन चरित्र में दिखाई देता है। साहस एक ऐसा महान गुण है जिसके द्वारा इंसान इंसान से देव तुल्य इंसान बन सकता है।


विवेक: माता सीता अत्यंत विवेकी थी। उन्होंने जीवन के ऐसे फैसले, जिसमें ज्ञानी से ज्ञानी व्यक्ति और साधु से साधु व्यक्ति भी धर्म संकट में पड़ जाए, उन फसलों को भी अत्यंत सहजता से धर्म, नीति, न्याय में रहते हुए सही फैसले लिए हैं। माता सीता का विवेक ही है जो उन्हें एक आदर्श नारी, एक आदर्श मां, और एक आदर्श पत्नी इन तीनों जिम्मेदारियां को, इन तीनों रूपों को सफलतापूर्वक निभाने में मददरूप साबित हुआ। 


यह अक्सर देखा गया है जो भी स्त्री विवेकी होती है वह सदैव अपने परिवार को संगठित रखते हुए उनके उन्नति, प्रगति और विकास में मदद करती है। वह अपने विवेक के माध्यम से अपने परिवार में हमेशा खुशी का माहौल बनाए रखती है।


क्षमा: मां का एक रूप क्षमा ही होता है। माता सीता ने अपने जीवन में क्षमा के ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए हैं जो इतने महान है कि, उन्हें शब्दों में बता पाना नामुमकिन है। मां सीता ने क्षमा के उस सात्विक भाव को प्रदर्शित किया है, जिस भाव के द्वारा इंसान सदैव खुश रहता है। उसका इस संसार में कोई वेरी नहीं रहता। माता सीता ने उन विषम परिस्थितियों में भी क्षमा धर्म के भाव को नहीं त्याग, जिन विषम परिस्थितियों में अत्यंत उदार व्यक्ति भी अपने इस क्षमा धर्म के भाव को त्याग दे।


क्षमा इस एक गुण को अगर व्यक्ति अच्छी तरह समझ ले तो, उसके जीवन से संपूर्ण रूप से नाश हो जाएगा स्ट्रेस का, एंजायटी का, डिप्रेशन का। और जीवन परिपूर्ण हो जाएगा खुशियों से शांति से। क्षमा सुधरता है आपके पारिवारिक रिश्तों को, सामाजिक रिश्तों को साथ ही साथ व्यावसायिक रिश्तो को भी।


और अंत में, मैंने जो गुणगान किया माता सीता के जीवन चरित्र का, उनके गुनो का वह सिर्फ लेस मात्र है। उनकी महानता तो मेरे इस गुणगान से कई लाख गुना अधिक है।


जय सियाराम

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः

 (ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण) अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं? व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌॥ आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन साङ्‍ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌॥ श्रीभगवान बोले- हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा (साधन की परिपक्व अवस्था अर्थात पराकाष्ठा का नाम 'निष्ठा' है।) मेरे द्वारा पहले कही गई है। उनमें से सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग से (माया से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरतते हैं, ऐसे समझकर तथा मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं में कर्तापन के अभिमान से रहित हो...

सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः

 ( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )  संजय उवाच  तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥ संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा श्रीभगवानुवाच  कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन। श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥ इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा अर्जुन उवाच  कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥ अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के...

श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय :

  (श्रद्धा का और शास्त्रविपरीत घोर तप करने वालों का विषय) अर्जुन उवाच ये  शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥ अर्जुन बोले- हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी? श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु॥ श्री भगवान्‌ बोले- मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा (अनन्त जन्मों में किए हुए कर्मों के सञ्चित संस्कार से उत्पन्न हुई श्रद्धा ''स्वभावजा'' श्रद्धा कही जाती है।) सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी- ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है। उसको तू मुझसे सुन सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥. हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि रा...

अक्षर ब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः

 ( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )   अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥ हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥ श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर 'ब्रह्म' है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा 'अध्यात्म' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह 'कर्म' नाम से कहा गया है अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, ह...

गुणत्रयविभागयोगो नामचतुर्दशोऽध्यायः

  (ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत्‌ की उत्पत्ति)   श्रीभगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम्‌। यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥ श्री भगवान बोले- ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।  सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥ इस ज्ञान को आश्रय करके अर्थात धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌।  सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥ हे अर्जुन! मेरी महत्‌-ब्रह्मरूप मूल-प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ को स्थापन करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पति होती है सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ हे अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर...

ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः

  ( विज्ञान सहित ज्ञान का विषय )   श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन  ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥ मैं तेरे लिए इस विज्ञान सहित तत्व ज्ञान को सम्पूर्णतया कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः॥ हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्‍कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्‌। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्‌॥ पृ...

विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः

  ( विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना )  अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्‌। यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥ अर्जुन बोले- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया। त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्‌॥ क्योंकि हे कमलनेत्र! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर। द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥ हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो। योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्‌॥ हे प्रभो! (उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय तथा अन्तर्यामी रूप से शासन करने वाला होने से भगवान का नाम 'प्रभु' है) यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है- ऐसा आप मानते हैं, तो हे...

दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः

  (फलसहित दैवी और आसुरी संपदा का कथन)   श्रीभगवानुवाच  अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌॥ श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति (परमात्मा के स्वरूप को तत्त्व से जानने के लिए सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में एकी भाव से ध्यान की निरन्तर गाढ़ स्थिति का ही नाम 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' समझना चाहिए) और सात्त्विक दान (गीता अध्याय 17 श्लोक 20 में जिसका विस्तार किया है), इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान्‌ के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्‌। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्‌॥ मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण (अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों म...

आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः

  ( कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण )   श्रीभगवानुवाच  अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥ श्री भगवान बोले- जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव। न ह्यसन्न्यस्तसङ्‍कल्पो योगी भवति कश्चन॥ हे अर्जुन! जिसको संन्यास (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥ योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जात...

विषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः।

  धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।  मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥ धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? संजय उवाच दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।  आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌॥ संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌।  व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥ हे आचार्य! आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।  युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥ धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌।  पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌। सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और...