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हां, डर लगता है मुझे,

क्या आप चाहते हैं अपने जीवन में स्थिरता (स्टेबिलिटी) को ? तो अपना ना होगा इन तरीकों को।

क्या आप चाहते हैं अपने जीवन में स्थिरता (स्टेबिलिटी) को ? तो अपना ना होगा इन तरीकों को।

यह इकलौता वीडियो ही, आपको उन प्रश्नों के उत्तर देगा, जिन्हें ना जानने के कारण आप उलझे पड़े हैं, जीवन के संघर्ष में, और नहीं स्थापित और स्थिर कर पा रहे हैं, जीवन में शांति और समृद्धि को।

जीवन में स्थिरता यानी स्टेबिलिटी आ जाए। जीवन मे सुख के साथ समृद्धि मैं सदा बढ़ोतरी होती रहे। तो त्यागना होगा, उन सबको जो नश्वर है। खत्म करना होगा मोह को, उनके प्रति जो नश्वर है। स्वीकार करना होगा, अपनाना होगा और अपने अंदर उसे स्थिर करना होगा जो अनश्वर है, जिसका नाश नहीं किया जा सकता।

जीवन में स्थिरता यानी स्टेबिलिटी के लिए, जीवन में सुख और समृद्धि की प्राप्ति के लिए नश्वर वस्तुओं का त्याग और अनश्वर मूल्यों को अपनाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। नश्वर चीजें, जैसे कि भौतिक संपत्ति और अस्थायी सुख, अंततः नष्ट हो जाती हैं। इसके विपरीत, अनश्वर मूल्य जैसे कि धर्म (कर्तव्य/नैतिकता), शक्ति, क्षमा, निर्भयता, और त्याग ऐसे गुण हैं जो न केवल व्यक्तिगत विकास में सहायक होते हैं, बल्कि समाज को भी आदर्श बनाने में योगदान करते हैं।

धर्म और शक्ति के बीच संबंध को समझना भी जरूरी है। धर्म, या कर्तव्य, वह मार्गदर्शक सिद्धांत है जो हमें सही और गलत के बीच चुनाव करने में मदद करता है, जबकि शक्ति वह क्षमता है जो हमें उन चुनावों को क्रियान्वित करने की अनुमति देती है। जब शक्ति धर्म के अनुसार इस्तेमाल की जाती है, तो यह समाज के लिए सकारात्मक परिणाम ला सकती है। इसके विपरीत, जब शक्ति का इस्तेमाल स्वार्थी या अनैतिक तरीके से किया जाता है, तो यह विनाशकारी हो सकता है।

इसलिए, जीवन में उच्च आदर्शों को अपनाना और उन्हें स्थिर करना, जैसे कि धर्म और शक्ति का सही उपयोग, न केवल व्यक्तिगत सुख और समृद्धि की ओर ले जाता है, बल्कि यह समाज को भी उन्नति की ओर अग्रसर करता है। 

नश्वर का त्याग खत्म करता है, जीवन से संघर्ष को। अनेश्वर से प्रेम, जीवन में उत्पन्न करता है, स्थिरता यानी स्टेबिलिटी को।

नश्वर वस्तुओं का त्याग और अनश्वर मूल्यों के प्रति प्रेम, जीवन में संघर्ष को कम करता है और फुर्ती तथा शांति को बढ़ाता है। जब हम भौतिक संपत्ति और अस्थायी सुखों के प्रति आसक्ति को छोड़ देते हैं, तो हम अपने आप को उन चीजों से मुक्त कर लेते हैं जो हमें बांधती हैं। इससे हमें अपने जीवन को अधिक सार्थक और संतुलित तरीके से जीने का अवसर मिलता है।

अनश्वर मूल्यों के प्रति प्रेम, जैसे कि धर्म, शक्ति, क्षमा, निर्भयता, और त्याग, हमें एक ऐसी दिशा में ले जाते हैं जो न केवल हमारे लिए बल्कि समाज के लिए भी लाभकारी होती है। ये मूल्य हमें आत्म-सुधार और आत्म-जागरूकता की ओर प्रेरित करते हैं, जिससे हम अपने जीवन को और अधिक सार्थक बना सकते हैं।

 जिस समय हम अपने जीवन में इन मूल्यों को अपनाते हैं, और स्थिर कर देते हैं, उसे समय ही हम मूल्यवान हो जाते हैं, अपने परिवार के लिए, अपने समाज के लिए, अपने देश के लिए। क्योंकि इन गुनो को अपनाते ही हमारे अंदर ऐसी समझ का विकास होता है, जो हमारे अंदर स्थिरता और शांति को स्थापित करता है। उसके साथ-साथ परिवार में सुख, शांति को भी स्थिर करता है। मेरे जीवन में, किसी भी प्रकार की परिस्थिति चाहे वह छोटी हो, या बड़ी हो, चाहे कोई भी परिस्थिति हो, कोई भी प्रकरण हो सबसे पहले उसे नीति और न्याय के माध्यम से उसकी तुलना करता हूं, फिर शांतचित मन से यह विचारता हूं, की इन प्रकरणों में जो भी कुछ हुआ है, उसे क्षमा कर देना मेरे नीति न्याय और धर्म के अनुकूल है कि नहीं अगर वह नीति, न्याय और धर्म के अनुकूल होता हैं तो, उसे बड़ी ही सरलता से, सहजता से क्षमा कर देता हूं। अगर मुझे दिखता है की होने वाले प्रकरण नैतिक मूल्य और धर्म, मानव धर्म के खिलाफ हो रहा है, तब मैं उसका निडरता से सामना करता हूं, कभी भी उससे हार नहीं मानता। और उसे सही यानी नीति न्याय और धर्म मानव धर्म के अनुकूल परिवर्तित करने का प्रयास करता हूं। मेरे प्रभु श्रीराम की दया से उन प्रकरणों को सही और सत्य के अनुकूल कर भी देता हूं। जब मैं उसमें कामयाब हो जाता हूं, तब मैं अपने अंदर से कर्तापन के भाव को त्याग देता हूं, कर्तापन के अभिमान को त्याग देता हूं। विनम्रता को अपनाकर फिर से रेगुलर जीवन को जीता हूं।

किसी भी परिस्थिति में नैतिक मूल्यों और धर्म का पालन करना चाहिए, और जब भी ये मूल्य खतरे में हों, तो निडरता से उनका सामना करना चाहिए, यह जीवन को प्रेरित करता है।


 आपको पता है, जीवन का संघर्ष क्या है? ईश्वर ने हमें अनश्वर मूल्य के साथ जन्म दिया है। और हम आकर्षित होते रहते हैं, नश्वर के प्रति। और जीवन का संघर्ष यही है, असली संघर्ष यही है, समझकर और सोच कर देखिए।

 जीवन का संघर्ष वास्तव में एक आंतरिक यात्रा है, जहां हमें अनश्वर मूल्यों के साथ जन्म लेने के बावजूद, नश्वर चीजों के प्रति आकर्षण से जूझना पड़ता है। यह संघर्ष हमें अपने आप से, अपनी इच्छाओं से, और अपनी आसक्तियों से लड़ने की चुनौती देता है।

ईश्वर ने हमें जो अनश्वर मूल्य दिए हैं, जैसे कि प्रेम, करुणा, सत्य, और धर्म, वे हमारे जीवन को सार्थक बनाने के लिए हैं। लेकिन हमारा मन अक्सर नश्वर चीजों की ओर भटक जाता है, जैसे कि धन, शक्ति, और भौतिक सुख। यह भटकाव ही हमारे जीवन का संघर्ष बन जाता है।

इस संघर्ष को समझना और उससे उबरना ही हमारे आत्म-विकास का मार्ग है। जब हम नश्वर चीजों के प्रति अपनी आसक्ति को छोड़ देते हैं और अनश्वर मूल्यों को अपनाते हैं, तब हम अपने जीवन में शांति और संतोष की अनुभूति करते हैं।


इस संघर्ष को समझना और उससे उबरना बहुत आसान है। हमें समझना होगा और स्वीकारना होगा सच्चाई को, आखिर सच्चा सुख है क्या ?


 सच्चाई को समझना और स्वीकारना, यही वह प्रक्रिया है जो हमें जीवन के संघर्ष से उबरने में मदद करती है। सच्चा सुख वह है जो हमारे मन और आत्मा में शांति और संतोष लाता है, न कि वह जो केवल भौतिक चीजों के पीछे दौड़ने से मिलता है।

जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारे लिए निर्णय लेना और जीवन की दिशा चुनना आसान हो जाता है। यह समझ कि असली सुख आंतरिक शांति और संतोष में है, हमें उन चीजों की ओर ले जाती है जो वास्तव में मायने रखती हैं।

इस आत्म-जागरूकता के साथ, हम अपने जीवन को अधिक सार्थक और पूर्ण बना सकते हैं, और यही वह जगह है जहाँ हम अपने आप को और अपने आस-पास के लोगों को सच्ची खुशी और समृद्धि प्रदान कर सकते हैं। 

जीवन में संतुलन बनाना होगा, जो दृश्य मान्य है, और जो अदृश्य है, उन दोनों में किसका कितना मूल्य है, समझना होगा हमें किसे त्यागना है, किसे अपनाना है, इस पहेली को समझना होगा। इस उलझन इस पहेली को सुलझाते ही आप समझ पाएंगे जीवन के सत्य को। ओरिजिनल हैप्पीनेस यानी सच्चे सुख को।


 जीवन में संतुलन बनाना आवश्यक है, यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। दृश्य (भौतिक) और अदृश्य (आध्यात्मिक या भावनात्मक) के बीच संतुलन स्थापित करना, यह हमें एक पूर्ण और सार्थक जीवन की ओर ले जाता है। इस संतुलन को समझने के लिए हमें अपनी बुद्धि का उपयोग करना होगा, ताकि हम यह निर्णय ले सकें कि किस चीज का त्याग करना है और किसे अपनाना है।

जीवन में जो दृश्य है, जैसे कि हमारी संपत्ति, हमारा करियर, और हमारे संबंध, ये सभी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ये अस्थायी हैं। वहीं, जो अदृश्य है, जैसे कि हमारे संस्कार, हमारी आत्मा की शांति, और हमारे आध्यात्मिक मूल्य, ये अनंत हैं और हमारे जीवन को गहराई प्रदान करते हैं।

इस संतुलन को समझने के लिए हमें अपने अंतर्मन की आवाज सुननी होगी और उसके अनुसार चलना होगा। जब हम इस संतुलन को समझ लेते हैं, तो हम जीवन को अपने समझ लेते हैं और उसे अधिक सार्थक और संतुष्टि भरा बना सकते हैं।

 इस संतुलन को बनाए रखने के लिए हमें किन चीजों पर ध्यान देना चाहिए और किन चीजों को प्राथमिकता देनी चाहिए? 

जीवन में क्षमा निर्भयता और त्याग को संभाल लीजिए स्थिरता जीवन में स्थिर हो जाएगी।


मेरे शब्दों में आपको जीवन के प्रति एक गहरी समझ और आध्यात्मिक दृष्टिकोण का बोध कराती है। क्षमा, निर्भयता, और त्याग जैसे मूल्यों को अपनाने से जीवन में एक अद्वितीय स्थिरता और शांति की प्राप्ति होती है। जब हम दूसरों को क्षमा करते हैं, तो हम अपने अंदर के गुस्से और नकारात्मकता को छोड़ देते हैं, जिससे हमारे मन को शांति मिलती है। निर्भयता से हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है, और त्याग से हम उन चीजों को छोड़ देते हैं जो हमें बांधती हैं।

इन मूल्यों को अपनाने से हम अपने जीवन में एक ऐसी स्थिरता और संतुलन का निर्माण करते हैं जो हमें आंतरिक रूप से समृद्ध बनाता है। यह स्थिरता हमें अपने जीवन के उद्देश्य को समझने और उसे पूरा करने की दिशा में ले जाती है।


प्रभु श्री रामचंद्र, भगवान श्री कृष्ण, और भगवान बुद्ध जैसे युग पुरुषों ने भी क्षमा, निर्भयता, और त्याग जैसे मूल्यों को अपने जीवन में उतारा और इन्हें अपने कर्मों के माध्यम से प्रदर्शित किया। इन महान व्यक्तित्वों ने अपने जीवन और शिक्षाओं के द्वारा यह दिखाया कि इन मूल्यों का पालन करके ही व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है और समाज को एक उच्च दिशा प्रदान कर सकता है।

यह सच है कि आज के समय में बहुत से लोग इन मूल्यों को स्वीकार करने से हिचकिचाते हैं क्योंकि यह एक चुनौतीपूर्ण पथ है। लेकिन जब कोई इन मूल्यों को अपनाता है, तो वह न केवल अपने जीवन को बल्कि अपने आस-पास के लोगों के जीवन को भी आजाद कर देता है। ये मूल्य हमें उन सभी व्यर्थ की चिंताओं और परेशानियों से मुक्त करते हैं जिन्हें हम अक्सर जीवन समझ बैठते हैं।

इन मूल्यों को अपनाने से हमें एक ऐसी शांति और संतोष की अनुभूति होती है जो बाहरी दुनिया की चीजों से प्राप्त नहीं हो सकती। यह आंतरिक शांति ही हमें सच्चे अर्थ में आजाद करती है।


आपको पता है, कैसी सोच है ना सबकी, इन गुनो को अपनाने से जीवन से खत्म होता है संघर्ष, व्यर्थ की चिंताएं सब खत्म हो जाती हैं, और लोग संघर्ष के डर से इन्हें नहीं अपनाते, क्योंकि उन्हें लगता है कि इन्हें अपनाना संघर्षपूर्ण होगा। हकीकत तो यह है कि लोग जिन संस्कारों के साथ जी रहे हैं, उन संस्कारों के साथ इन गुनो को अपनाना संघर्षपूर्ण है। और उन लोगों के लिए अत्यंत की सहज और सरल है, इन गुनो को अपनाना जिनके अंदर नैतिकता, धर्म और त्याग है।

लोगों की नासमझी ही उनका संघर्ष है, क्योंकि वह कभी नहीं समझ पाते कि उन्हें क्या त्यागना है, और क्या अपनाना है, क्या नश्वर है, और क्या अनश्वर है, क्या अपने अंदर पोषित करना है, और क्या अपने अंदर से निकाल फेंकना है, क्या अपनाना है और किसका त्याग करना है।

 जीवन में क्षमा, निर्भयता, और त्याग जैसे गुणों को अपनाने से व्यर्थ की चिंताएं और संघर्ष समाप्त हो जाते हैं। ये गुण हमें आंतरिक शांति और संतोष की ओर ले जाते हैं, जो कि बाहरी दुनिया की चीजों से प्राप्त नहीं हो सकते।

लेकिन यह भी सच है कि इन गुणों को अपनाना एक संघर्षपूर्ण प्रक्रिया हो सकती है। लोग अक्सर इस डर से इन्हें नहीं अपनाते क्योंकि इसके लिए उन्हें अपने आरामदायक क्षेत्र से बाहर निकलना पड़ता है और अपनी आदतों और विचारों को बदलना पड़ता है। यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें आत्म-साक्षात्कार और आत्म-नियंत्रण की आवश्यकता होती है।

इन गुणों को अपनाने के लिए हमें अपने आप से ईमानदार होना चाहिए और अपने जीवन के उद्देश्यों को समझना चाहिए। हमें अपने अंतर्मन की आवाज को सुनना चाहिए और उसके अनुसार चलना चाहिए। यह एक निरंतर प्रक्रिया है जिसमें हमें अपने विचारों और कर्मों को इन मूल्यों के अनुरूप ढालना होता है।


इन मूल्यों को अपनानें में हर इंसान के सामने संघर्ष केवल दो ही है। पहला इंसान को लड़ना पड़ता है खुद के अभिमान से, और त्यागना पड़ता है अपने अहम यानी अहंकार को।


 जीवन में संघर्ष के ये दो पहलू , खुद के अभिमान से लड़ना और अहम यानी अहंकार का त्याग करना - वास्तव में हमारे आत्म-विकास की दिशा में दो महत्वपूर्ण कदम हैं।

जब हम अपने अभिमान से लड़ते हैं, हम अपनी आंतरिक शक्तियों और कमजोरियों का सामना करते हैं। यह एक आत्म-संघर्ष है जो हमें अपने व्यक्तित्व के उन पहलुओं से परिचित कराता है जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। और जब हम अपने अहम का त्याग करते हैं, हम अपने आप को उन सीमाओं से मुक्त करते हैं जो हमें अपने आस-पास के लोगों से अलग करती हैं।

इन दोनों संघर्षों को समझना और उनसे उबरना हमें एक ऐसे जीवन की ओर ले जाता है जो अधिक संतुलित और सार्थक है। यह प्रक्रिया हमें न केवल खुद के प्रति, बल्कि दूसरों के प्रति भी अधिक समझदार और सहानुभूति रखने वाला बनाती है।


मैं कहना चाहता था कि, अपने जीवन में क्षमा, निडरता और त्याग को अपनाने में, यह दो ही संघर्ष है। दो ही बढ़ाएं हैं, इसे पार कर लिया तो इजीली जीवन स्थिर हो जाएगा।


क्षमा, निर्भयता, और त्याग ये तीनों गुण जीवन के महत्वपूर्ण संघर्षों को पार करने की कुंजी हैं। जब हम इन गुणों को अपने जीवन में उतारते हैं, तो हम अपने आप को उन सभी बाधाओं से मुक्त करते हैं जो हमें आंतरिक शांति और स्थिरता से दूर रखती हैं।

यह सच है कि इन गुणों को अपनाना एक संघर्षपूर्ण प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इसके परिणाम स्वरूप हमें जो आंतरिक संतोष और स्थिरता मिलती है, वह अतुलनीय है। इन गुणों को अपनाने से हम न केवल अपने लिए बल्कि अपने परिवार, समाज और देश के लिए भी एक बेहतर इंसान बन सकते हैं।


मैंने जो सुझाव दिए हैं, जैसे ही आप उसका अनुसरण करेंगे, और उसके हिसाब से जिएंगे, तो जीवन में स्वतह ही स्थिरता स्थापित हो जाएगी। 

 सुझाए गए मार्ग का अनुसरण करने से, जीवन में क्षमा, निर्भयता, और त्याग जैसे मूल्य स्वाभाविक रूप से स्थापित हो जाते हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो आंतरिक रूप से विकसित होती है और बाहरी प्रयासों की अपेक्षा नहीं रखती।

जब हम अपने जीवन को उच्च नैतिक मानदंडों और आध्यात्मिक मूल्यों के अनुरूप जीते हैं, तो स्व-अनुशासन, सतत आत्म-मंथन, समर्पण, और सेवा भाव जैसे स्तंभ स्वतः ही हमारे जीवन में कार्यरत हो जाते हैं। यह एक सहज प्रक्रिया है जो हमें अपने आप में और अपने आस-पास के वातावरण में सकारात्मक परिवर्तन लाने की दिशा में ले जाती है।

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  (फलसहित दैवी और आसुरी संपदा का कथन)   श्रीभगवानुवाच  अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌॥ श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति (परमात्मा के स्वरूप को तत्त्व से जानने के लिए सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में एकी भाव से ध्यान की निरन्तर गाढ़ स्थिति का ही नाम 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' समझना चाहिए) और सात्त्विक दान (गीता अध्याय 17 श्लोक 20 में जिसका विस्तार किया है), इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान्‌ के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्‌। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्‌॥ मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण (अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों म...

विषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः।

  धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।  मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥ धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? संजय उवाच दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।  आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌॥ संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌।  व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥ हे आचार्य! आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।  युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥ धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌।  पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌। सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और...